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जैविक खेती के लिए सामयिक पहल

जैविक कृषि एक सम्पूर्ण कृषि कार्यमाला है जिसमें पर्यावरण को स्वच्छ रखते हुए प्राकृतिक संतुलन को कायम रखकर भूमि, जलवायु को प्रदूषित किये बिना, दीर्घकालीन व टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पध्दति में जीवांश एवं प्रकृति प्रदत्त संसाधनों एवं कार्बनिक अवशिष्ट यथा स्थान उपयोग किया जाता है। ताकि उत्पादन व्यय कम होकर अधिक से अधिक लाभ मिल सके। जैविक खेती से लक्षित उत्पादन प्राप्त करना संभव है। बहुआयामी प्रयासों से जिसमें लघु उपायों के बीच समन्वय स्थापित किया जाता है। उस समन्वित उपाय के तीन प्रमुख घटक तत्व हैं। एकीकृत पौध संरक्षण प्रबंधन, एकीकृत कीट व व्याधि प्रबंधन और एकीकृत मृदा जल प्रबंधन, इन तीनों घटकों को प्रभावशाली ढंग से अपनाकर ही टिकाऊ खेती करना संभव होगा।

राज्य शासन ने जल स्त्रोतों तथा मिट्टी को संरक्षित व प्रदूषण मुक्त एवं स्वस्थ्य पर्यावरण निर्माण करने के लिए विभिन्न स्तर पर जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम अपनाया है। एकीकृत पौध पोषण तथा एकीकृत कीट एवं व्याधि प्रबंधन के लिए कृषि विभाग ने प्रत्येक विकासखंड के एक चयनित जैविक ग्राम में जैविक कृषि तकनीक को विस्तृत रूप से अपनाया है। जिससे भूमि में जीवांश  जीवाणुओं का संरक्षण हो, फसल अवशेषों को यथास्थान उपयोग, उत्पादन लागत में कमी लाकर टिकाऊ खेती के तरीकों का विकास व खेती को लाभप्रद बनाना है। जैविक पौध पोषण के अंतर्गत कृषि विभाग द्वारा चयनित जैविक खेती गांव में कृषकों द्वारा जैविक खादों का उपयोग किया गया है इसके अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं।

आधुनिक कृषि में किसानों ने कृषि उत्पादन बढ़ाकर देश के करोड़ों लोगों की भूख शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, परन्तु उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भूमि के स्वास्थ्य में निरंतर गिरावट आ रही है। असंतुलित उर्वरकों का उपयोग, रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग व फसल अवशेषों का जलाना इत्यादि से भूमि की उर्वरा शक्ति घटती जा रही है। परिणामस्वरूप आदानों का उपयोग बढ़ाना पड़ रहा है। कृषकों पर कृषि उत्पादन प्राप्त करने के लिए अधिक लागत का बोझ पड़ रहा है। ऐसी परिस्थिति में जैविक कृषि विधि ही एकमात्र साधन है जो भूमि का स्वास्थ्य सुधार कर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकती है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही मध्यप्रदेश शासन के कृषक कल्याण एवं कृषि विकास विभाग ने देश में सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर जैविक कृषि को अपनाया है।

जल ही जीवन है जीवन का आधार मृदा है। हमारे देश में दोनों ही प्राकृतिक संसाधन जल एवं भूमि सीमित है। इनका सही दोहन ही आने वाली पीढ़ी की अर्थव्यवस्था की धरोहर होगी। भारत में प्रतिवर्ष 5.33 अरब टन मिट्टी का कटाव होता है जो अपने साथ 53.3 लाख टन नत्रजन, स्फुर व पोटाश बहाकर ले जाता है। जिसकी कीमत दो हजार करोड़ से अधिक है। वास्तव में बड़ी मात्रा में हमारी विदेशी मुद्रा उर्वरक क्रय करने में खर्च होती है। इस नुकसान को कम करने के लिए राज्य शासन ने वृहद रूप में जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम अपनाया जिसके तहत जल व मिट्टी संरक्षण कार्य में मदद मिली है। मध्यप्रदेश शासन कृषि विभाग ने वैज्ञानिक आधार पर यह निश्चित किया कि मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्य में बनायी जा रही संरचनाओं के अलावा मिट्टी में ही ऐसी क्षमता पैदा की जाये कि उसका क्षरण कम हो। मिट्टी के कण आपस में एक दूसरे को अधिक शक्ति से पकड़कर रखें व जल का भी उपयुक्त संरक्षण हो। मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाना जैविक खेती को अपनाकर ही संभव हो सकता है।

खेतों में फसल उत्पादन में जिन 16 तत्वों की आवश्यकता होती है उनमें प्रमुख रूप से नत्रजन, स्फुर, फासफोरस तत्व का महत्व सबसे अधिक होता है। इन तत्वों में से किसी एक तत्व की कमी से जहां फसल उत्पादन में गंभीर रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से फसल की उत्पादन क्षमता और उत्पादकता में कमी आयी है अथवा पहले जैसा उत्पादन लेने में डेढ़ से दो गुना अधिक उर्वरक देना पड़ रहा है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो रही है। स्फुर की उपलब्धता बढ़ाने में सहायक पी.एस.बी. कल्चर, लिग्राइट चारकोल के काले चूर्ण में मिलाकर जैव उर्वरक बनाया जाता है। कल्चर के प्रति ग्राम भाग में इन जीवाणु की संख्या 10 करोड़ के बराबर होती है। ऐसे जीवाणु के कार्यशीलता जमीन में उपलब्ध कार्बनिक पदार्थों की मात्रा पर निर्भर करती है। इस कल्चर के उपचार से करीब 25-30 किलो प्रति हैक्टेयर स्फुर युक्त रासायनिक उर्वरक की बचत हो सकती है। इससे विभिन्न फसलों के उत्पादन में 15 से 30 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादन में पाया जा सकता है। राज्य शासन ने प्रदेश के सभी जिलों के 3130 ग्रामों का चयन कर कृषि विभाग ने जैविक खेती कार्यक्रम लागू किया है। इससे प्राप्त परिणामों एवं इस कार्यक्रम के प्रति कृषकों के बढ़ते रुझान को देखते हुए लगभग एक हजार से अधिक ग्रामों में जैविक खेती कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

मध्यप्रदेश को देश में सर्वाधिक प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त है। प्रदेश जैविक खेती की अकूत संभावनाओं से भरा है। राज्य की अर्थ-व्यवस्था के समग्र विकास में कृषि के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए मध्यप्रदेश में शासन ने अनेक प्रभावी कदम उठाये हैं। राज्य की कृषि, अनेक कृषि एवं गैर कृषि गतिविधियों का वृहद मिश्रण है, जो उस पर निर्भर विभिन्न संस्थाओं एवं व्यक्तियों की जीविका का आधार है। जैविक खेती राज्य में कृषि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है। कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए राज्य सरकार वचनबध्द है। इसके अंतर्गत संसाधन प्रबंधन, तकनीकी विकास एवं व्यापक प्रसार उत्पादन वृध्दि के लिये प्रभावी अनुसंधान द्वारा देश के प्रगतिशील राज्यों के समकक्ष उत्तरोत्तर बढ़ती वृध्दि दर प्राप्त करना आदि विभिन्न मुद्दों को ध्यान में रखकर जैविक कृषि की रणनीति तैयार की गई है। मंडला, डिण्डोरी, बालाघाट, उमरिया, शहडोल, अनूपपुर, झाबुआ, खरगोन, नीमच, मंदसौर, बुरहानपुर, बैतूल, सीहोर, अलीराजपुर, बड़वानी और दमोह जिलों में जैविक खेती की जा रही है।

संपूर्ण विश्व में बढ़ती जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान के चक्र को प्रभावित करता है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण भी प्रदूषित होता है। मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीनकाल में मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था। फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। भारत में प्राचीनकाल से कृषि के साथ-साथ गौ-पालन किया जाता है था। कृषि एवं गौ-पालन संयुक्त रूप से अत्याधिक लाभकारी व्यवसाय था, जो प्राणि-मात्र और वातावरण के लिए अत्यन्त उपयोगी था। बदलते परिवेश में गौ-पालन धीरे-धीरे कम हो गया तथा कृषि में तरह-तरह की रासायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है। फलस्वरूप जैविक और अजैविक पदार्थों के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। वातावरण प्रदूषित होकर, मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अब हम रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों के उपयोग के स्थान पर, जैविक खादों एवं दवाइयों का उपयोग कर, अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इससे भूमि, जल एवं वातावरण शुध्द रहेगा और मनुष्य एवं प्रत्येक जीवधारी स्वस्थ रहेंगे। भारत में ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था का मुख्य आधार और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है, जिससे सामान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्याधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है। साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं। इसलिए इन सभी समस्याओं से निपटने के लिये गत वर्षों से निरन्तर टिकाऊ खेती के सिध्दान्त पर खेती करने की सिफारिश की गई। इसे प्रदेश के कृषि विभाग ने बढ़ावा दिया, जिसे हम 'जैविक खेती' के नाम से जानते हैं। जैविक खेती से भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृध्दि हो जाती है, सिंचाई अंतराल में वृध्दि होती है, रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से काश्त लागत में कमी आती है, फसलों की उत्पादकता में वृध्दि होती है, जैविक खाद के उपयोग से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है, भूमि की जल-धारण क्षमता बढ़ती है, भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होता है, पर्यावरण की दृष्टि से भूमि के जल-स्तर में वृध्दि होती है, मिट्टी, खाद्य पदार्थ और जमीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है। कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी आती है। फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृध्दि के साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है।

जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में बराबर या अधिक उत्पादन देती है। इस प्रकार जैविक खेती मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में पूर्णत: सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है इसके साथ ही कृषक को आय अधिक प्राप्त होती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में भी जैविक उत्पाद अधिक खरे उतरते हैं। फलस्वरूप सामान्य उत्पादन की अपेक्षा में कृषक अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक समय में निरन्तर बढ़ती जनसंख्या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शक्ति का संरक्षण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यन्त लाभदायक है।

कैसे कटे, कृषि रसायनों का जाल?

कृषि रसायनों ने हमारी मिट्टी, पानी, हवा और सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। सबसे गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर हुए हैं। कैंसर, हृदयरोग, नपुंसकता, गुर्दे, लिवर, ऑंखों, बालों, मस्तिष्क व आंतों में आने वाले विकारों की तह में इन कृषि रसायनों का बड़ा योगदान होता है। उपभोक्ताओं व किसानों की उम्र में 5 से 15 वर्ष तक कमी हो चुकी है। इन्हीं रसायनों व नए बीजों की वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में व्यवसाय व हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

मारी आज की बाजार व्यवस्था में

    फसल के रंग-रूप और आकार को ही गुणवत्ता का आधार मानकर मूल्य निर्धारण किया जाता है। भुगतान वजन के आधार पर किया जाता है। चाहे वह फसल पर्यावरण व स्वास्थ्य की कीमत पर ही क्यों न उगाई गई हो। फसल के पोषणमान, स्वाद, टिकाऊपन तथा फसल के पीछे की सोच का फसल मूल्य से कोई संबंध नहीं रहा। आंखें देखती हैं सब्जी, अनाज, दाल या फल को, लेकिन उसमें उनका अपना नैसर्गिक पोषण, स्वाद व अन्य गुण नहीं होते। रसायन आधारित खेती से ऐसी ही फसलें हम पैदा कर रहे हैं। सिर्फ फसल उगाने के तरीके में फर्क करने से ही उसके पोषणमान में 100 गुना से भी ज्यादा अंतर आना संभव है। यानि कि 100 से भी ज्यादा टमाटरों से आपको जो पोषण नहीं मिल सकता वह सिर्फ 1 टमाटर से ही मिल सकता है। लेकिन ऐसी बातें कितने लोग जानते और सोचते हैं? आज तो चाहे उत्पादक हों, चाहे उपभोक्ता। सभी की सोच एक ही है पैसा-पैसा और सिर्फ पैसा। इसके अलावा कुछ और सोचने के लिए समय किसके पास है?

अधिकांश कृषक अधिक कमाई के लालच में जहरीली रासायनिक दवाईयों में उर्वरकों के उपयोगों के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते हैं। यही जहरीले रसायन फलों, सब्जियों, अनाजों, दालों, मसालों, खाद्य तेलों, दूध, अंडे, मांस, पानी आदि के साथ आपके शरीर में प्रवेश कर आपकी सेहत को तबाह करते हैं। उस गलती की सजा सभी पाते हैं, जो करते कुछ लोग हैं। कृषि रसायनों ने हमारी मिट्टी, पानी, हवा और सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। सबसे गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर हुए हैं। कैंसर, हृदयरोग, नपुंसकता, गुर्दे, लिवर, आंखों, बालों, मस्तिष्क व आंतों में आने वाले विकारों की तह में इन कृषि रसायनों का बड़ा योगदान होता है। उपभाक्ताओं व किसानों की उम्र में 5 से 15 वर्ष तक कमी हो चुकी है। इन्हीं रसायनों व नए बीजों की वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में व्यवसाय व हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

इन रसायनों व बीजों की वजह से कृषक कर्ज में डूब रहे हैं और आत्महत्या के लिए बाध्य हो रहे हैं। कृषि रसायनों और बीजों के व्यवसाय से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहों में भारत की समृध्द जैव विविधता खटक रही है। इसे समाप्त करने में वे काफी सफल भी रही हैं। एक बार यदि हमने अपने पारम्परिक बीज खो दिए तो हम हमेशा के लिए इन कंपनियों के गुलाम हो जाएंगे। तब हमें हमेशा उनके द्वारा पेटेंट किए बीज उनके मनमाने दामों पर खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। अपने इन नापाक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए व अधिक उपज, कीट रोधित, रोग रोधित, खरपतवारनाशी रसायन रोधिता का दावा करने वाले संकर बीज, जीन अंतरिक बीज तथा अगली पीढ़ी की अंकुरण क्षमता रहित टर्मिनेटर बीज भारतीय किसानों में प्रसारित कर रहे हैं। स्मरणीय है कि स्वपरागित फसलों में अल्प मात्रा में ही सही लेकिन परपरागण भी होता है। इस तरह इन जीन अंतरित बीजों के परागकण हमारी स्थानीय वनस्पतियों के साथ गर्भाधान कर उनके अनुवांशिक गुणों को नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे। पर्यावरण व जन स्वास्थ्य के लिए भी ऐसी किस्में गंभीर खतरा बन सकती हैं।

विश्व के अनेक भागों में हुए शोध कार्य से तथाकथित वरदान माने जाने वाले कृषि रसायनों के परिणाम सामने आ रहे हैं

मानसिक क्षमता में कमी- नार्थ डाकेटा यूनिवर्सिटी अमेरिका के वैज्ञानिकों ने 7 से 12 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों पर अध्ययन कर पाया है कि कृषि रसायनों का भरपूर प्रयोग करने वाले फार्मों में तथा उनके समीप रहने वाले बच्चों का आई.क्यू. लेवल फार्म से दूर रहने वाले बच्चों की तुलना में काफी नीचा है। वृध्दों के भूलने की बीमारी अलजाइमर्स का संबंध भी कृषि रसायनों से जुड़ा पाया गया है। यानि ये रसायन मनुष्य की मानसिक क्षमता को भी कम कर रहे हैं।

यौन अक्षमता - डेनमार्क के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया है कि रासायनिक खाद, कीटनाशी फफूंदनाशी, खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग के दौरान संपर्क में आने पर वे किसानों के आंख, नाक, त्वचा और होठों की कोशिकाओं के मार्फत शरीर में प्रवेश कर रक्त के साथ वीर्य में पहुँचकर उसकी पी.एच. कम करके उसे अम्लीय बना देते हैं तथा प्रति एम.एल. वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 7.5 करोड़ से घटकर 4.4 करोड़ रह जाती है। क्षतिग्रस्त शुक्राणुओं की संख्या भी बढ़ जाती है। इन सब बातों से उनकी प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

अनुवांशिकता में हस्तक्षेप - केरेबियन देशों में गन्ने की सघन खेती वाले क्षेत्रों में लड़कियों में 7 वर्ष की उम्र में ही माहवारी शुरू  हो गई। पक्षियों के अंडों के छिलके इतने पतले हो गए कि वे असानी से फूट जाते थे। डी.डी.टी. से सेक्स में परिवर्तन के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। यानि कि, ये रसायन हमारी अनुवांशिकता के वाहक क्रोमोजोम्स पर स्थित जीन्स की संरचना में भी अवांछित परिवर्तन करने में सक्षम हैं।

घटती उम्र - मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में सब्जियों की खेती में कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग करने वाले ग्राम बड़गांव माली में विगत कई वर्षों से कोई भी व्यक्ति साठ वर्ष की उम्र तक नहीं पहुँच पाया है। यहां 25 वर्षीय युवा 50 वर्ष के अधेड़ नजर आते हैं।

भोजन से रोग - चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार गेहूँ की फसल में उर्वरकों का प्रयोग बढ़ने से रोटी में भी उर्वरक अवशेष बढ़ते जा रहे हैं। लम्बे समय तक ऐसे गेहूँ के प्रयोग से हार्ट तथा लिवर से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं या लकवा भी हो सकता है।

शरीर में रक्त के साथ बह रहे हैं कृषि रसायन भी - पंजाब के भटिंडा और मुक्तसर जिलों के ग्रामीणों के रक्त के नमूनों की जांच करने पर सबसे खराब नमूनों में 13 तरह के कीटनाशक पाए गए।

भोपाल गैस कांड - सन् 1984 में बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रात्रि के समय लीक हुई मिथाइल आइसो सायनाइड गैस से 5 लाख 72 हजार लोग प्रभावित हुए। रिसाव के 25 साल बाद भी करीब एक लाख लोगों का लम्बा इलाज चल रहा है। प्रभावितों की दूसरी तथा तीसरी पीढ़ी में भी विकलांगता व अन्य जन्मजात विकृतियां पाई जा रही हैं। महिलाओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं तथा कैंसर रोगियों की संख्या में चौंकाने वाली वृध्दि हुई है।

कृषि रसायनों की घटती क्षमता बढ़ती कीमतें - सन् 1980 में एक किलो उर्वरक के प्रयोग से अनाज उत्पादन में 12-14 किलो की वृध्दि होती थी। सन् 2000 में यह वृध्दि 7 किलो रह गई थी और अब यह और तीव्र गति से घट रही है। किन्तु इनकी कीमतें उसी तीव्र गति से बढ़ती जा रही हैं। इसी प्रकार अनेक कीटनाशी रसायन जो शुरुआती दौर में 30-40 रुपये प्रति लीटर मिलते थे, आज बाजार में 8500 रुपये प्रति लीटर कीमत के कीटनाशी रसायन उपलब्ध हैं। कीटों में प्रतिवर्ष नए-नए रसायनों के लिए प्रतिरोध क्षमता विकसित होती जा रही है। आखिर इस दुष्चक्र का अंत कहां जाकर होगा?

उपरोक्त उदाहरण इशारा कर रहे हैं कि गत आर्थिक वर्षों में सरकार ने कृषि में सिर्फ रासानिक उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए उत्पादक इकाईयों व आयातकों चाहे वे स्वदेशी हो या बहुराष्ट्रीय संगठन हो, को एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपये की अनुदान सहायता दी है। ताकि कृषकों को उर्वरक कम दामों पर उपलब्ध हो सके। यह सहायता लगभग 10 हजार रुपये प्रति हैक्टेयर होती है।

कीट, रोग, खरपतवार नाशी रसायनों के लिए दी अनुदान सहायता इसके अतिरिक्त है। क्या इस सकल राशि में से प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत भाग कटौती करके जैविक कृषि में आगे आने वाले कृषकों को 10 हजार रुपये प्रति हैक्टेयर प्रतिवर्ष मात्रा 3 वर्ष तक सहायता नहीं दी जा सकती है? प्रति वर्ष 10 प्रतिशत रकबा जैविक खेती में बदलकर 10 वर्ष में हम संपूर्ण भारत को एक कृषि रसायन मुक्त राष्ट्र में बदल सकते हैं, वह भी बगैर किसी अतिरिक्त लागत के तथा उत्पादन में किसी बड़ी गिरावट की आशंका को निर्मूल साबित करते हुए। इस तरह 12 वर्ष बाद हमें किसानों को उर्वरक अनुदान सहायता देने की आवश्यकता नहीं रहेगी। अन्यथा 12 वर्षों में यह राशि एक लाख 40 हजार करोड़ रुपये से बढ़ाकर हमें 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये करना होगी। जो लगभग 20 हजार रुपये प्रति हैक्टेयर होगी। तब प्रति हैक्टेयर, जो राशि हम अनुदान के रूप में देंगे क्या उतनी कीमत की फसल भी हमें मिल पाएगी?

गौ आधारित जैविक कृषि

कृषि एक ऐसा विषय है जिसमें हमारा संबंध प्रकृति के समस्त घटकों से होता है। इसमें हम भूमि, जल, वायु, वृक्ष पौधे, गाय व बैल, कीट संसार और भूमि में रहने वाले असंख्य सूक्ष्म जीव जंतुओं से सीधे जुड़े रहते हैं। इसी से हमें प्रकृति के सह-अस्तित्व की अवधारणा को समझने में आसानी होती है। वर्तमान में विकास के पश्चिमी मॉडल को अपनाकर हमारे अधिकांश कृषक प्रकृति के सह-अस्तित्व के सिध्दांत को भूल गये हैं एवं स्व-अस्तित्व को बनाये रखने के लक्ष्य में प्रकृति के अपने मित्र घटकों (जल, जंगल, जमीन, पशुधन आदि) को नष्ट करते जा रहे हैं। आज इसके गम्भीर परिणाम कृषक समाज को देखने पड़ रहे हैं। रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के अधिक उपयोग से एवं जीवांश खादों का उपयोग न करने से भूमि निर्जीव होती जा रही है। दिन प्रतिदिन पानी की कमी हो रही है एवं वातावरण में ऊष्णता बढ़ रही है। कृषि पध्दति पर्यावरण मित्र न होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है। अधिकांश कृषक कर्ज के दुष्चक्र में उलझ गये हैं। कृषकों द्वारा हताश होकर आत्महत्या करने की घटनायें बढ़ती जा रही हैं।

आज अगर हम अपना हित चाहते हैं, तो आवश्यकता है प्रकृति के विविध घटकों (जल, जंगल, जमीन, पशुधन आदि) के हितों को ध्यान में रखते हुए कृषि कार्य करने की। कम लागत की पर्यावरण मित्र, स्वावलंबी कृषि पध्दति को अपनाने की। बिना गौवंश के टिकाऊ कृषि की कल्पना ही संभव नहीं है। प्राचीनकाल से ही यह कहा जाता रहा है कि ''गौमये वसते लक्ष्मी पवित्रा सर्वमंगला'' अर्थात गोबर में परम पवित्र सर्वमंगलमयी लक्ष्मीजी का निवास है। इसका अर्थ हमें यह समझना चाहिये कि जो कृषक, कृषि में गोबर व गौमूत्र का उपयोग करेंगे उनके यहां लक्ष्मीजी का वास रहेगा। यह बात सत्य भी साबित हो रही है। जब से हमारे कृषकों ने गोबर, गौ मूत्र का महत्व भूलकर रासायनिक कृषि को अपनाया है, तबसे हमारे कृषकों के यहां से लक्ष्मीजी रूठ गयी हैं। टिकाऊ कृषि तंत्र के विकास में गौवंश अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है।

हम विगत 12 वर्षों से मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र के अनेक कृषकों के साथ, जैविक कृषि कार्य कर रहे हैं। प्रारंभ में हम जैविक कृषि के दार्शनिक पक्ष को महत्व देते थे, किन्तु यह समझ में आया कि अर्थ की दुनिया में अर्थ की भाषा ही समझ में आती है। हमने कृषकों को जैविक कृषि के दार्शनिक पक्ष के साथ, आर्थिक पक्ष भी समझाना प्रारंभ किया। विभिन्न फसलों में जैविक कृषि द्वारा शुध्द लाभ गणना द्वारा कृषकों को जागरूक किया गया, परिणाम अत्यंत सार्थक हुआ।

गौ आधारित जैविक कृषि के आर्थिक, तकनीकी एवं सामाजिक महत्व  :

गौ आधारित जैविक कृषि से भूमि प्रबंधन : हमने अपने अनुभवों में पाया कि रासायनिक कृषि पध्दति से भूमि के भौतिक गुणों में ह्रास हुआ है। भूमि कठोर होती जा रही है। रासायनिक कृषि को लेकर कृषकों का अनुभव यह कहता है कि खेत को तैयार करने के लिए अब पहले की तुलना में अधिक जुताई व बखरनी करनी पड़ती है। इसके विपरीत जैविक कृषि में जीवांश पदार्थ के कारण भूमि नरम बनती है। विभिन्न शोध कार्यों से यह स्पष्ट हुआ है कि बैलों द्वारा तैयार किये एवं बोये गये खेतों की कृषि उत्पादकता अधिक होती है। ट्रेक्टर चलित भारी यंत्रों के उपयोग से भूमि में वायुसंचार, जल संरचरण कम होता है जिसका फसलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ट्रेक्टर धुऑं दे सकते हैं, गोबर, गौमूत्र नहीं। जैविक कृषकों का अनुभव यह कहता है कि खेत को कम जुताई में अच्छा तैयार किया जा सकता है। यदि एक से दो जुताई व बखरनी कम हुई तो प्रति एकड़ लगभग 350-700 रुपये की बचत हो सकती है।

गौ आधारित जैविक कृषि से जल प्रबंधन : रासायनिक कृषकों का अनुभव यह कहता है कि जिन खेतों में पूर्व में बतर या बराफ आने में 7-8 दिन लगते थे, वे खेत आज 2-3 दिन में ही बराफ/बतर में आ जाते हैं। रासायनिक खेती में फसलों में पानी अधिक लगता है। अधिक पानी से भूमि का पी.एच. मान बिगड़ रहा है जिसका फसलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। कृषकों की बिजली पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। हमने अपने प्रक्षेत्र अनुभवों में पाया कि गौ आधारित जैविक कृषि में रासायनिक खेती की तुलना में 1-2 पानी कम लगता है। हम अनुमान लगा सकते हैं कि देश के शुध्द सिंचित क्षेत्र में फसलों को प्रति एकड़ एक से दो पानी कम लगने पर जल और अर्थ की कितनी बचत हो सकती है? प्रति एकड़ एक पानी का खर्चा लगभग 400-500 रुपये आता है। (हमारे देश में शुध्द सिंचित क्षेत्र लगभग 160 मिलियन एकड़ है)

गौ आधारित जैविक कृषि से बीज तथा फसल व्यवस्थापन : रासायनिक कृषि पध्दति में कृषकों को महंगे बीज खरीदने की आदत पड़ गयी है। संकर महंगे बीजों की तुलना में गौ आधारित जैविक कृषि पध्दति देशी सुधारित बीजों के विकास पर महत्व देती है। देशी सुधारित बीजों से उत्पादित फसलों की ऊँचाई अधिक होती है, जो पशुओं के चारा व्यवस्थापन में लाभप्रद है। देशी उन्नत फसलों में पानी भी कम लगता है। इसमें हर वर्ष बीज खरीदने की आवश्यकता भी नहीं है। कृषक चयन पध्दति द्वारा अपने खेत में स्वावलंबी बीज उत्पादन कर इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकते हैं। आधुनिक कृषि पध्दति में कृषकों को एकल फसल पध्दति की आदत पड़ गयी है। ऐसे में मौसम की अनिश्चितता में उन्हें बहुत अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसके विपरीत गौ आधारित जैविक कृषि पध्दति फसल विविधता, वानिकी, हार्टिकल्चर फसलों के समन्वयन पर आधारित है। इसमें कृषकों को मौसम की प्रतिकूलताओं में भी किसी न किसी फसल में आमदनी मिल जाती है। बीज को रोगरहित बनाने उसकी अंकुरण क्षमता बढ़ाने के लिये बीजामृत का उपयोग किया जाता है। बीजामृत बनाने के लिये गाय का ताजा गोबर (1 कि.ग्रा.) गोमूत्र (1 लीटर), दूध (100 मि.ली.), चूना (50 ग्राम), मुट्ठी भर जीवाणु मिट्टी (मेड़ की) को 10 लीटर पानी में मिलाकर मटके में दो दिनों तक रखते हैं। तत्पश्चात जिस दिन बोवनी करना हो उस दिन इस मिश्रण से बीजोपचार कर बीज को छायेदार स्थान में सुखाकर बोवनी करते हैं। म.प्र. के कई आदिवासी कृषक चने के बीज को छांछ से उपचारित कर बोते हैं। इन तकनीकों के लाभकारी परिणाम मिल रहे हैं।

गौ आधारित जैविक कृषि से पौध पोषण व्यवस्थापन : रासायनिक पोषण प्रणाली का अनुभव यह कहता है कि कृषकों को हर वर्ष रासयानिक उर्वरकों की मात्रा बढ़ानी पड़ रही है। इसी प्रकार इन उर्वरकों के मूल्य में भी हर वर्ष बढ़ोतरी हो रही है। इन उर्वरकों के परिवहन (देश/विदेश से) में हजारों व लाखों लीटर डीजल का उपयोग किया जा रहा है। उर्वरक उद्योग को सरकार द्वारा प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जा रही है। एक बोरी डी.ए.पी. की सरकारी खरीद मूल्य में लगभग एक से डेढ़ ट्राली गोबर खाद आ सकती है, विचारणीय है। यदि ये सब्सिडी सीधे कृषकों को दी जाये तो गौ संवर्धन के कार्य को बढ़ावा देकर, खेतों को पर्याप्त जीवांश खाद दिया जा सकता है।

जीवांश खाद : जीवांश खाद भूमि की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक संरचना सुधारते हैं। भूमि की जलधारण क्षमता एवं वायु संचार बढ़ाते हैं। गोबर गौमूत्र के उपयोग से फसलों के वनस्पतिक अवशेष, चारा इत्यादि को जल्दी विघटित कर उच्च गुणवत्ता की कम्पोस्ट खाद बनायी जाती है। जैविक पदार्थों के विघटन से काला पदार्थ बनता है जिसे ह्यूमस कहते हैं, यह पौधों का सम्पूर्ण आहार है। रासायनिक पोषण प्रणाली में अधिकांश कृषक केवल दो या तीन तत्व ही फसल को देते हैं। पौधे की स्वस्थ वृध्दि एवं विकास के लिये 16 तत्वों की आवश्यकता होती है, इनकी आपूर्ति जीवांश खादों से ही संभव है।

गोबर गैस प्लांट : गोबर गैस प्लांट की स्थापना से कृषक परिवार को न सिर्फ धुआं रहित ईंधन प्राप्त होता है अपितु इससे प्राप्त स्लरी एक उन्नत जैविक खाद का काम करती है। गोबर गैस का निर्माण कर वृक्षों की कटाई पर रोक लगाकर ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। गाय का ताजा गोबर (10 किलोग्राम) गौमूत्र (10 लीटर), गुड़ (आधा किलो) तथा किसी भी दाल का आटा (आधा किलो) इस मिश्रण को पुराने मटके में 5-8 दिनों तक रखते हैं। उन्नत जीवाणु कल्चर बनता है जिसे जीवामृत कहते हैं। इसे 200 लीटर पानी में अच्छे से मिलाकर एक एकड़ भूमि में उपयोग करते हैं। इसे सिंचाई जल के साथ भी दे सकते हैं। इसके उपयोग से फसलों की वृध्दि और विकास अच्छा होता है। मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र के अनेक कृषक इसका उपयोग कर रहे हैं। इसी प्रकार एक मटका जीवामृत को 250 लीटर पानी में घोलकर सूती कपड़े से छान लिया जाता है। छने हुए पानी को फसलों पर छिड़कने से अच्छी वृध्दि व विकास होता है एवं अधिक फूल लगते हैं। यह एक अच्छा पौध वृध्दि कारक है। दक्षिण भारत में पंचगव्य (गोबर गोमूत्र, दूध, दही व घी के मिश्रण) का उपयोग फसलों में पौधे वृध्दिकारक के रूप में किया जाता है। गाय के जनने के समय थैली का पानी (जार या एम्निऑटिक फ्लयूइड) अलग एकत्र कर रखते हैं।

गाय का दूध : गाय के दूध (3 प्रतिशत विलयन पानी में) का छिड़काव कई मिर्च उगाने वाले कृषक अधिक फलन हेतु करते हैं। ताजी छांछ व मट्ठा (3 प्रतिशत विलयन पानी में) के फसलों पर छिड़काव के अच्छे परिणाम मिले हैं। गोमाता में आकाशीय शक्तियों को आकर्षित करने की ताकत होती है, इसी के आधार पर जैवगतिकीय कृषि का जन्म हुआ है। प्राकृतिक रूप से मृत देशी गाय के सींग में गोबर तथा सिलिका के उपयोग से क्रमश: नुस्खा 500 तथा 501 का निर्माण किया जाता है। जैवगतिकीय खादों की अल्प मात्रा लगती है तथा इसके परिणाम भी उत्साहवर्धक हैं। केन्द्रीय उपोष्ण उद्यानिकी संस्थान द्वारा जैवगतिकीय खादों के लाभकारी परिणामों को शोध कार्यों द्वारा बतलाया गया है। देश के कई कृषकों द्वारा गाय के घी को कंडों पर चावल के साथ हवन कर कृषि पर्यावरण को शुध्द कर, अग्निहोत्र कृषि पध्दति के माध्यम से फसलोत्पादन प्राप्त किया जा रहा है।

गौ आधारित जैविक कृषि से कीट, रोग नियंत्रण : प्रक्षेत्र अनुभव यह कहता है कि रासायनिक पध्दति से प्रति वर्ष कीट रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है। कीटनाशक उद्योगों का व्यापार हर वर्ष बढ़ रहा है। कीट तो नहीं मर रहे अपितु किसान ही मर रहे हैं। हर वर्ष नये और नाना प्रकार के कीट व रोग कृषकों की समस्या बनते जा रहे हैं। सब्जियों, कपास, अंगूर आदि फसलों में किसान प्रति एकड़ हजारों रुपये का कीटनाशक, रोगनाशक उपयोग करते हैं। इसके विपरीत गौ आधारित जैविक कृषि पध्दति में गाँव में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर जैविक कीट व रोग प्रतिकर्षक बनाया जाता है। यदि किसान भाई निम्बोली काढ़ा, पंच पर्णाक, छांछ, गोमूत्र, मिर्च, लहसुन चटनी आदि कीट नियंत्रकों का उपयोग करें तो हमारे देश के हजारों करोड़ रुपये बच सकते हैं।

गौमूत्र :  गौमूत्र में तैंतीस प्रकार के घटक होते हैं। इसमें उपस्थित मैंगनीज व कार्बोलिक एसिड फफूंदनाशक व कीट प्रजनन रोधक का कार्य करते हैं। गोमूत्र (4 लीटर) में निंबोली पावडर (2.5 किलोग्राम) को 10 लीटर पानी में मिलाकर तीन दिन के लिये गलाते हैं। तत्पश्चात मिश्रण को उबालकर आधा कर लेते हैं तथा छानकर अलग रख लेते हैं। इस छने हुए काढ़े के 3 प्रतिशत पानी में बने विलयन को फसलों पर छिड़कने से अच्छा कीट नियंत्रण होता है। इसी प्रकार पाँच प्रकार की पत्तियों नीम, सीताफल, अकाव, धतूरा व बेशरम (प्रत्येक आधा किलो) कुल 2.5 किलोग्राम पत्तियों को 4 लीटर गोमूत्र व 10 लीटर पानी में तीन दिन तक गलाते हैं। तत्पश्चात मिश्रण को उबालकर आधा कर लेते हैं इसे छानकर, छनित काढ़े के 3 प्रतिशत, पानी में बने विलयन को कपास आदि फसलों में छिड़कने पर अच्छा कीट नियंत्रण मिलता है। 20-25 दिन पुरानी छांछ/मट्ठा के 3 प्रतिशत, पानी में बने विलयन का छिड़काव फसलों पर करने से प्रभावी कीट नियंत्रण होता है।

गौ आधारित जैविक कृषि से वैश्विक ऊष्णता : रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन, परिवहन एवं उपयोग से, कृषि में ट्रेक्टर आदि बढ़ते यंत्रीकरण से ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। नाइट्रस ऑक्साइड को गंभीर श्रेणी की ग्रीन हाउस गैस माना गया है। कारखानों से खेत तक तथा खेत से थाली तक की श्रृंखला में ऊर्जा का अनावश्यक दुरुपयोग हो रहा है। वैश्विक ऊष्णता को कम करने में, स्वावलंबी गौ आधारित जैविक कृषि पध्दति महत्वपूर्ण घटक साबित होगी। मौसम परिवर्तन से कृषकों को बहुत अधिक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

गौ आधारित जैविक कृषि से मानव स्वास्थ्य : पूर्व में एक कहावत प्रचलित थी जैसा होगा अन्न, वैसा ही होगा मन और वैसा ही होगा शरीर। रासायनिक पध्दति में उत्पादित विषैले अन्न, सब्जियों, फलों का वास्तव में मानव के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रेमभाव कम होता जा रहा है वहीं दूसरी ओर बढ़ती बीमारियों से ग्रामीण परिवार परेशान हैं। वर्ष भर हर परिवार द्वारा लगभग 2 से 5 हजार रुपये का स्वास्थ्य पर खर्च होना आम बात हो गयी है। हमारा यह प्रबल विश्वास है कि जैविक कृषि पध्दति से उत्पादित शुध्द अनाज, सब्जी, फलों का सेवन करने से देश के लाखों करोड़ों रुपये (स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च) की बचत की जा सकती है। जैविक कृषि पध्दति से सामाजिक समरसता बढ़ाकर अप्रत्यक्ष रूप से देश के आर्थिक विकास में सहभागी बना जा सकता है।

 

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